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क्या आप भी खाते है तेरहवीं पर खाना, तो आज ही छोड़ दें वरना...


वास्तुशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है, जो व्यक्ति के आसपास के वातावरण के अनुसार ही उसकी सफलता और असफलता निर्धारित कर देता है। ऐसे में यह ज़िंदगी के हर पहलू पर अपनी छाप छोड़ देता है और इसका सबसे बड़ा असर देखने को मिलता है भोजन पर। जब दोनों के दिल में दर्द और पीड़ा हो ऐसी स्थिती में कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए।' 

नहीं करें तेहरवीं पर भोजन:

वहीं कहते हैं कि महाभारत की इस कथा को बुद्धिजीवियों ने मृत्युभोज यानि तेरहवीं से जोड़ा हुआ है और इसकी मानें तो जब किसी सगे-संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो उस समय तेरहवीं पर आने वालों और जिनके घर में मौत हुई है, दोनों के मन में विरह का दर्द होता है।

क्या है इसका कारण:

उस समय भोजन करवाने वाला और करने वाला दोनों ही दुखी होते हैं और इसके लिए श्रीकृष्ण कहते हैं,' शोक में करवाया गया भोजन व्यक्ति की ऊर्जा का नाश करता है इसका मतलब है कि मृत्युभोज या तेरहवीं पर भोजन नहीं खाना चाहिए क्योंकि उससे ऊर्जा का नाश होता है। 

वहीं गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है ‘आत्मा अजर, अमर है, आत्मा का नाश नहीं हो सकता, आत्मा केवल युगों-युगों तक शरीर बदलती है।’

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